श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.138.17 
यस्त्वमित्रेण संदध्यान्मित्रेण च विरुद्धॺते।
अर्थयुक्तिं समालोक्य सुमहद् विन्दते फलम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति का अवसर देखकर शत्रु से संधि कर लेता है और मित्रों के प्रति शत्रुता बढ़ा लेता है, उसे महान फल की प्राप्ति होती है।
 
He who, seeing an opportunity to fulfil his selfish ends, makes a treaty with his enemy and increases his hostility against his friends, attains a great reward. 17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)