श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 160-161h
 
 
श्लोक  12.138.160-161h 
अभ्राणामिव रूपाणि विकुर्वन्ति क्षणे क्षणे।
अद्यैव हि रिपुर्भूत्वा पुनरद्यैव मे सुहृत्॥ १६०॥
पुनश्च रिपुरद्यैव युक्तीनां पश्य चापलम्।
 
 
अनुवाद
मित्रता और शत्रुता के रूप प्रतिक्षण बादलों की भाँति बदलते रहते हैं। आज तुम मेरे शत्रु हो, फिर आज मित्र बन सकते हो, और फिर आज पुनः शत्रु बन सकते हो। देखो, यह स्वार्थ-संबंध कितना चंचल है?॥160 1/2॥
 
‘The forms of friendship and enmity keep changing like clouds every moment. Today you can be my enemy and then become my friend today and then you can become my enemy again today. See, how fickle this selfish relationship is?॥ 160 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)