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mahabharat 12.138.156-157h: अब मेरे शरीर को खाने के अलावा और क्या कारण रह गया है कि मैं मान लूं कि तुम सचमुच मुझसे प्रेम करते हो? इस समय मैं तुम्हारा स्वार्थ अच्छी तरह समझ रही हूं।   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.138.156-157h 
किं नु तत् कारणं मन्ये येनाहं भवत: प्रिय:॥ १५६॥
अन्यत्राभ्यवहारार्थं तत्रापि च बुधा वयम्।
 
 
अनुवाद
अब मेरे शरीर को खाने के अलावा और क्या कारण रह गया है कि मैं मान लूं कि तुम सचमुच मुझसे प्रेम करते हो? इस समय मैं तुम्हारा स्वार्थ अच्छी तरह समझ रही हूं।
 
‘Now apart from eating my body, what other reason is there left for me to believe that you really love me? I understand very well your selfishness at this time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)