श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 155-156h
 
 
श्लोक  12.138.155-156h 
उत्पन्ना कारणे प्रीतिरासीन्नौ कारणान्तरे॥ १५५॥
प्रध्वस्ते कारणस्थाने सा प्रीतिर्विनिवर्तते।
 
 
अनुवाद
‘जो प्रेम किसी कारण (स्वार्थ) से उत्पन्न होता है, वह तब तक बना रहता है जब तक वह कारण विद्यमान रहता है। जब उस कारण का स्थान नष्ट हो जाता है, तो उस कारण से उत्पन्न हुआ प्रेम भी स्वतः ही लुप्त हो जाता है।॥155 1/2॥
 
‘The love that is generated for some reason (self-interest) remains as long as that reason exists. When the place of that reason is destroyed, the love that was generated for that reason also automatically disappears.॥ 155 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)