श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 150-151
 
 
श्लोक  12.138.150-151 
ब्रवीषि मधुरं यच्च प्रियो मेऽद्य भवानिति॥ १५०॥
तन्मित्र कारणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु।
कारणात् प्रियतामेति द्वेष्यो भवति कारणात् ॥ १५१॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त तुम जो मीठी-मीठी बातें कह रहे हो कि ‘आज तुम मुझे बहुत अच्छे लगे’, उसका भी एक कारण है, हे मित्र! वह सब मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक बताता हूँ, सुनो। मनुष्य किसी न किसी कारण से प्रेम का पात्र और किसी न किसी कारण से द्वेष का पात्र बनता है॥150-151॥
 
‘Apart from this, the sweet things you are saying that ‘today I like you very much’ have a reason for this too, my friend! I will tell you all of that in detail, listen. A man becomes the object of love and the object of hatred due to a reason.॥ 150-151॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)