श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.138.15 
संधातव्यं बुधैर्नित्यं व्यवस्य च हितार्थिभि:।
अमित्रैरपि संधेयं प्राणा रक्ष्या हि भारत॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! कर्तव्य का विचार करके हित चाहने वाले विद्वान् मित्रों के साथ सदैव संधि करनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं के साथ भी संधि कर लेनी चाहिए; क्योंकि प्राणों की रक्षा करना सदैव कर्तव्य है॥15॥
 
Bharat! After considering the duty, one should always make treaties with learned friends who wish well and if required, one should also make treaties with enemies; because protecting lives is always a duty.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)