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mahabharat 12.138.143-144h: जो मनुष्य स्वार्थ-सम्बन्धों का विचार न करके अपने मित्रों पर विश्वास और शत्रुओं पर अविश्वास करता रहता है, तथा जो मित्र हो या शत्रु, सबके प्रति प्रेमभाव रखने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिए ॥143 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 143-144h
 
 
श्लोक  12.138.143-144h 
यो विश्वसिति मित्रेषु न विश्वसिति शत्रुषु।
अर्थयुक्तिमविज्ञाय य: प्रीतौ कुरुते मन:॥ १४३॥
मित्रे वा यदि वा शत्रौ तस्यापि चलिता मति:।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य स्वार्थ-सम्बन्धों का विचार न करके अपने मित्रों पर विश्वास और शत्रुओं पर अविश्वास करता रहता है, तथा जो मित्र हो या शत्रु, सबके प्रति प्रेमभाव रखने लगता है, उसकी बुद्धि भी चंचल ही समझनी चाहिए ॥143 1/2॥
 
'The person who, without thinking of selfish relationships, keeps trusting his friends and distrusting his enemies, and who starts developing loving feelings towards everyone, whether friend or enemy, his intellect should also be considered fickle. ॥ 143 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)