श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  12.138.141 
नास्ति मैत्री स्थिरा नाम न च ध्रुवमसौहृदम्।
अर्थयुक्त्यानुजायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥ १४१॥
 
 
अनुवाद
मित्रता स्थायी नहीं है और शत्रुता भी स्थायी नहीं है। स्वार्थवश ही मित्र और शत्रु आते-जाते रहते हैं।॥141॥
 
‘Friendship is not a permanent thing and enmity is also not a permanent thing. Friends and enemies keep on coming due to selfishness.॥ 141॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)