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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान
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श्लोक 139
श्लोक
12.138.139
नास्ति जातु रिपुर्नाम मित्रं नाम न विद्यते।
सामर्थ्ययोगाज्जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥ १३९॥
अनुवाद
‘कभी कोई शत्रु या मित्र नहीं होता। लोग आवश्यक शक्ति के अनुसार एक दूसरे के मित्र और शत्रु बनते हैं ॥139॥
‘There is never any enemy or friend. People become friends and enemies of each other in relation to the necessary power.॥ 139॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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