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mahabharat 12.138.128: जो कुबुद्धि वाला मनुष्य पहले बहुत से मित्र बनाता है, परंतु उन मित्रों में दृढ़ नहीं रहता, वह दुःखदायी विपत्ति में पड़ने पर उन मित्रों को नहीं पाता, अर्थात् उनसे कोई सहायता नहीं पाता ॥128॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  12.138.128 
कृत्वा हि पूर्वं मित्राणि य: पश्चान्नानुतिष्ठति।
न स मित्राणि लभते कृच्छ्रास्वापत्सु दुर्मति:॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
जो कुबुद्धि वाला मनुष्य पहले बहुत से मित्र बनाता है, परंतु उन मित्रों में दृढ़ नहीं रहता, वह दुःखदायी विपत्ति में पड़ने पर उन मित्रों को नहीं पाता, अर्थात् उनसे कोई सहायता नहीं पाता ॥128॥
 
'A person of bad intellect who first makes many friends but does not remain steadfast in those friends, does not find those friends when he falls into a painful calamity, i.e. he does not get any help from them.॥ 128॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)