श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  12.138.127 
गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम्।
मित्रोपभोगसमये किं मां त्वं नोपसर्पसि॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
‘मित्र ! तूने विपत्ति के समय मुझ पर विश्वास करके मुझे जीवनदान दिया। अब मित्रता का सुख भोगने का समय है, ऐसे समय तू मेरे पास क्यों नहीं आता ?॥127॥
 
‘Friend! You believed me in times of trouble and gave me life. Now is the time to enjoy the happiness of friendship, why don't you come to me at such a time?॥ 127॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)