श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 110-111h
 
 
श्लोक  12.138.110-111h 
न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद् रिपु:।
अर्थतस्तु निबद्धॺन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥ ११०॥
अर्थैरर्था निबद्धॺन्ते गजैर्वनगजा इव।
 
 
अनुवाद
न कोई किसी का मित्र है, न कोई किसी का शत्रु। मित्र और शत्रु स्वार्थवश एक-दूसरे से बँधे रहते हैं। जैसे जंगली हाथी पालतू हाथियों से बँधे रहते हैं, वैसे ही धन भी धन से ही बँधा रहता है॥110 1/2॥
 
‘No one is anyone's friend nor anyone is anyone's enemy. Friends and enemies are bound to each other due to selfishness. Just as wild elephants are tied by domesticated elephants, in the same way, wealth is tied by wealth only.॥ 110 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)