श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  12.138.105 
यदि किंचिन्मयाज्ञानात् पुरस्ताद् दुष्कृतं कृतम्।
न तन्मनसि कर्तव्यं क्षामये त्वां प्रसीद मे॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
यदि पूर्वकाल में अज्ञानवश मैंने आपका कुछ अपराध किया हो तो आप उसे हृदय में न लें, क्षमा करें, मुझ पर प्रसन्न हों॥105॥
 
'If I have done any wrong to you in the past due to ignorance, then you should not take it to heart, I ask for forgiveness. Please be pleased with me.॥ 105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)