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mahabharat 12.138.102: श्रेष्ठ पुरुष अपने मित्रों का कार्य बड़े प्रेम और प्रसन्नता से करते हैं; तुम्हारी तरह नहीं। जैसे मैंने तुम्हें संकट से तुरन्त छुड़ाया॥102॥   |   mahabharat अध्याय 12.138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 138: शत्रुओंसे घिरे हुए राजाके कर्तव्यके विषयमें बिडाल और चूहेका आख्यान  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  12.138.102 
न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधव:।
यथा त्वां मोक्षित: कृच्छ्रात् त्वरमाणेन वै मया॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ पुरुष अपने मित्रों का कार्य बड़े प्रेम और प्रसन्नता से करते हैं; तुम्हारी तरह नहीं। जैसे मैंने तुम्हें संकट से तुरन्त छुड़ाया॥102॥
 
‘The best men perform the tasks of their friends with great love and happiness; not like you. As I rescued you from trouble immediately.॥ 102॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)