श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 136: राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.136.7 
असाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यो य: प्रयच्छति।
आत्मानं संक्रमं कृत्वा कृत्स्नधर्मविदेव स:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो राजा दुष्टों से धन छीनकर सज्जनों में बाँट देता है, स्वयं सेतु बनाकर सबको पार कराता है, उसे ही सब धर्मों का ज्ञाता समझना चाहिए ॥7॥
 
The king who snatches wealth from the wicked and distributes it among the noble men, makes himself a bridge and helps them all cross over. He should be considered the knower of all the religions. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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