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mahabharat 12.136.3-4h: भरतनंदन! ये सभी लोग क्षत्रिय हैं। राज्य भी क्षत्रिय ही भोगते हैं और सारा धन भी उन्हीं का है, किसी और का नहीं; किन्तु वह धन उनकी सेना के लिए या यज्ञ करने के लिए है। 3 1/2।   |   mahabharat अध्याय 12.136: राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 136: राजा किसका धन ले और किसका न ले तथा किसके साथ कैसा बर्ताव करे—इसका विचार  »  श्लोक 3-4h
 
 
श्लोक  12.136.3-4h 
इमा: प्रजा: क्षत्रियाणां राज्यभोगाश्च भारत।
धनं हि क्षत्रियस्यैव द्वितीयस्य न विद्यते॥ ३॥
तदस्य स्याद् बलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव च।
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! ये सभी लोग क्षत्रिय हैं। राज्य भी क्षत्रिय ही भोगते हैं और सारा धन भी उन्हीं का है, किसी और का नहीं; किन्तु वह धन उनकी सेना के लिए या यज्ञ करने के लिए है। 3 1/2।
 
Bharatanandan! All these people belong to the Kshatriyas. The kingdom is also enjoyed by the Kshatriyas and all the wealth is also theirs, not of anyone else; but that wealth is for his army or for performing Yagyas. 3 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)