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श्लोक 12.136.11  |
यथा ह्यकस्माद् भवति भूमौ पांसुर्विलोलित:।
तथैवेह भवेद् धर्म: सूक्ष्म: सूक्ष्मतरस्तथा॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे पृथ्वी की धूल को अचानक उठाकर पत्थर पर पीसने से वह और भी सूक्ष्म हो जाती है, वैसे ही विचार करने से धर्म का स्वरूप उत्तरोत्तर सूक्ष्म होता जाता है ॥11॥ |
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| Just as if the dust from the earth is suddenly taken and ground on a stone, it becomes even finer, so on contemplating, the nature of Dharma becomes increasingly subtle. ॥11॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३६॥
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