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न भयं तस्य भूतेभ्य: सर्वेभ्यश्चैव भारत।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यरण्येषु गोपति:॥ २६॥
अनुवाद
भरत! वह भूत-प्रेतों से भी नहीं डरता। राजा! वह किसी दुष्टात्मा से भी नहीं डरता। वह जंगल का राजा बन जाता है।
Bharat! He is not afraid of even the ghosts. King! He is not afraid of even any evil spirit. He becomes the ruler of the forest.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥