Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.134.16-17: ऐसा आचरण करनेवाला मनुष्य पापरहित होकर शीघ्र ही बहुत से लोगों का आदरपात्र बन जाता है, नाना प्रकार के सुखों का भोग करता है और अपने विशेष पुण्यों के प्रभाव से अपनी रक्षा करता है। वह संसार में सर्वत्र सम्मान पाने लगता है और इस लोक तथा परलोक में भी उसे महान फल प्राप्त होते हैं।॥16-17॥ | mahabharat अध्याय 12.134: बलकी महत्ता और पापसे छूटनेका प्रायश्चित्त । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अपापो ह्येवमाचार: क्षिप्रं बहुमतो भवेत्।
सुखं च चित्रं भुञ्जीत कृतेनैकेन गोपयेत्॥ १६॥
लोके च लभते पूजां परत्रेह महत् फलम्॥ १७॥
अनुवाद
ऐसा आचरण करनेवाला मनुष्य पापरहित होकर शीघ्र ही बहुत से लोगों का आदरपात्र बन जाता है, नाना प्रकार के सुखों का भोग करता है और अपने विशेष पुण्यों के प्रभाव से अपनी रक्षा करता है। वह संसार में सर्वत्र सम्मान पाने लगता है और इस लोक तथा परलोक में भी उसे महान फल प्राप्त होते हैं।॥16-17॥
A man of such conduct becomes sinless and soon becomes the object of respect of many people, enjoys various kinds of pleasures and protects himself by the effect of his special good deeds. He starts getting respect everywhere in the world and he gets great fruits in this world as well as the next.॥ 16-17॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥