Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.133.9-10h: भरत! ऐसा राजा कैसे सुखी रह सकता है? इसलिए राजा को सदैव परिश्रमी रहना चाहिए और कभी किसी के सामने झुकना नहीं चाहिए; क्योंकि परिश्रम ही पुरुषार्थ है। जैसे सूखी लकड़ी बिना गांठ के टूट जाती है, पर झुकती नहीं, उसी प्रकार राजा का नाश हो जाए, पर वह कभी वश में नहीं होना चाहिए॥9 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.133: राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन्दा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ईदृशस्य कुतो राज्ञ: सुखं भवति भारत।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्॥ ९॥
अप्यपर्वणि भज्येत न नमेतेह कस्यचित् ।
अनुवाद
भरत! ऐसा राजा कैसे सुखी रह सकता है? इसलिए राजा को सदैव परिश्रमी रहना चाहिए और कभी किसी के सामने झुकना नहीं चाहिए; क्योंकि परिश्रम ही पुरुषार्थ है। जैसे सूखी लकड़ी बिना गांठ के टूट जाती है, पर झुकती नहीं, उसी प्रकार राजा का नाश हो जाए, पर वह कभी वश में नहीं होना चाहिए॥9 1/2॥
Bharat! How can such a king be happy? Therefore, the king should always be diligent and should never bow down before anyone; because diligence is manliness. Just like a dry piece of wood breaks without any knots but does not bend, in the same way, the king may be destroyed but he should never be subdued.॥9 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥