श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 132: ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.132.16 
अपरे नैवमिच्छन्ति ये शंखलिखितप्रिया:।
मात्सर्यादथवा लोभान्न ब्रूयुर्वाक्यमीदृशम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
परंतु जो शंख और लिखित मुनि के प्रेमी हैं और उनके मत का पालन करते हैं, वे अन्य लोग उपर्युक्त मत (ऋत्विकों को दण्ड न देना आदि) को स्वीकार नहीं करते। वे ईर्ष्या या लोभ से ऐसी बातें नहीं कहते (वे इसे धर्म मानकर कहते हैं)।॥16॥
 
But those who are lovers of Shankh and Likhit Muni and follow their views, others do not accept the above-mentioned view (not punishing the Ritviks etc.). They do not say such things out of jealousy or greed (they say it considering it as a Dharma).॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)