श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 132: ब्राह्मणों और श्रेष्ठ राजाओंके धर्मका वर्णन तथा धर्मकी गतिको सूक्ष्म बताना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  12.132.1-2 
युधिष्ठिर उवाच
हीने परमके धर्मे सर्वलोकाभिसंहिते।
सर्वस्मिन् दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने॥ १॥
केन स्विद् ब्राह्मणो जीवेज्जघन्ये काल आगते।
असंत्यजन् पुत्रपौत्राननुक्रोशात् पितामह॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि राजा सम्पूर्ण जगत् की रक्षा का परम कर्तव्य नहीं निभा सकता और पृथ्वी पर जीविका के समस्त साधन लुटेरों द्वारा छीन लिए गए हैं, तब ऐसे घोर संकट के समय यदि ब्राह्मण दया करके अपने पुत्रों और पौत्रों का परित्याग नहीं कर सकता, तो वह किस कर्म से जीविका चलाए?"॥1-2॥
 
Yudhishthira asked, "Grandfather! If the king cannot perform the supreme duty of protecting the entire world and all the means of livelihood on earth are taken over by robbers, then in such a dire time of crisis, if a Brahmin cannot abandon his sons and grandsons out of compassion, then by what profession should he earn his living?"॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)