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mahabharat 12.130.44: हे भरतपुत्र! यज्ञ करने के उद्देश्य से मनुष्य को सभी प्रकार से धन का संग्रह करना चाहिए; इस प्रकार करने योग्य या न करने योग्य कर्मों के होने पर भी अन्य प्रकार से कर्ता को दोष नहीं लगता ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.130: आपत्तिके समय राजाका धर्म   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 130: आपत्तिके समय राजाका धर्म  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.130.44 
सर्वोपायैराददीत धनं यज्ञप्रयोजनम्।
न तुल्यदोष: स्यादेवं कार्याकार्येषु भारत॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! यज्ञ करने के उद्देश्य से मनुष्य को सभी प्रकार से धन का संग्रह करना चाहिए; इस प्रकार करने योग्य या न करने योग्य कर्मों के होने पर भी अन्य प्रकार से कर्ता को दोष नहीं लगता ॥ 44॥
 
O son of Bharata! With the objective of performing a sacrifice, one should collect wealth by all means; in this manner, even if the deeds which are to be done or not to be done are performed, the doer is not blamed as in other cases. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)