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mahabharat 12.130.37: जैसे यज्ञ के अनुष्ठान में जो करने योग्य नहीं है, वह भी यज्ञ के निमित्त किया जाता है (परन्तु वह दोषपूर्ण नहीं माना जाता)। उसी प्रकार संकट के समय प्रजा को कष्ट देने से राजा को दोष नहीं लगता ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 12.130: आपत्तिके समय राजाका धर्म   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 130: आपत्तिके समय राजाका धर्म  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.130.37 
अकार्यमपि यज्ञार्थं क्रियते यज्ञकर्मसु।
एतस्मात् कारणाद् राजा न दोषं प्राप्तुमर्हति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जैसे यज्ञ के अनुष्ठान में जो करने योग्य नहीं है, वह भी यज्ञ के निमित्त किया जाता है (परन्तु वह दोषपूर्ण नहीं माना जाता)। उसी प्रकार संकट के समय प्रजा को कष्ट देने से राजा को दोष नहीं लगता ॥37॥
 
Just as in the rituals of sacrifice, even that which is not worth doing is done for the sake of sacrifice (but it is not considered to be faulty). In the same way, in times of crisis, the king is not blamed for tormenting his subjects. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)