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mahabharat 12.130.28: राजन! इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसका स्वभाव हिंसा से रहित हो। अन्यों की तो बात ही छोड़िए, वन में एकान्त निवास करने वाले तपस्वी ऋषि का स्वभाव भी हिंसा से पूर्णतः रहित नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.130: आपत्तिके समय राजाका धर्म   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 130: आपत्तिके समय राजाका धर्म  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.130.28 
अन्यत्र राजन् हिंसाया वृत्तिर्नेहास्ति कस्यचित्।
अप्यरण्यसमुत्थस्य एकस्य चरतो मुने:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
राजन! इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसका स्वभाव हिंसा से रहित हो। अन्यों की तो बात ही छोड़िए, वन में एकान्त निवास करने वाले तपस्वी ऋषि का स्वभाव भी हिंसा से पूर्णतः रहित नहीं है।
 
King! There is no one in this world who has a nature that is devoid of violence. Forget about others, even the nature of the ascetic sage who lives alone in the forest is not completely devoid of violence. 28.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)