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mahabharat 12.130.22: संकटग्रस्त मनुष्य के लिए कौन-सा द्वार नहीं खुला रहता? (जिस मार्ग से वह बच निकलता है, वही उसके लिए द्वार है।) कैदी के लिए सबसे बुरा मार्ग कौन-सा है? (यदि वह बिना मार्ग के भी बच सकता है, तो ऐसा करने का प्रयत्न कर सकता है।) जब मनुष्य संकटों से घिरा होता है, तो वह बिना द्वार के भी बच निकलता है।॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.130: आपत्तिके समय राजाका धर्म   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 130: आपत्तिके समय राजाका धर्म  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.130.22 
पीडितस्य किमद्वारमुत्पथो विधृतस्य च।
अद्वारत: प्रद्रवति यदा भवति पीडित:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
संकटग्रस्त मनुष्य के लिए कौन-सा द्वार नहीं खुला रहता? (जिस मार्ग से वह बच निकलता है, वही उसके लिए द्वार है।) कैदी के लिए सबसे बुरा मार्ग कौन-सा है? (यदि वह बिना मार्ग के भी बच सकता है, तो ऐसा करने का प्रयत्न कर सकता है।) जब मनुष्य संकटों से घिरा होता है, तो वह बिना द्वार के भी बच निकलता है।॥22॥
 
Which door is not open for a man in trouble? (The way he escapes is the door for him). Which is the worst way for a prisoner? (If he can escape even without a way, he can try to do so). When a man is surrounded by troubles, he escapes even without a door.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)