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mahabharat 12.130.15-16: दुर्बल मनुष्य धर्म को प्राप्त करके भी न्यायोचित जीविका नहीं कमा पाता। धर्म का पालन करने से बल अवश्य प्राप्त होगा, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; इसलिए संकटकाल में अधर्म भी धर्म ही सुना जाता है। किन्तु विद्वान पुरुष यह मानते हैं कि संकटकाल में भी धर्म के विरुद्ध आचरण करने से अधर्म निश्चय ही अधर्म ही है।॥ 15-16॥   |   mahabharat अध्याय 12.130: आपत्तिके समय राजाका धर्म   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 130: आपत्तिके समय राजाका धर्म  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  12.130.15-16 
धर्मं प्राप्य न्यायवृत्तिं न बलीयान् न विन्दति।
यस्माद् बलस्योपपत्तिरेकान्तेन न विद्यते॥ १५॥
तस्मादापत्स्वधर्मोऽपि श्रूयते धर्मलक्षण:।
अधर्मो जायते तस्मिन्निति वै कवयो विदु:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
दुर्बल मनुष्य धर्म को प्राप्त करके भी न्यायोचित जीविका नहीं कमा पाता। धर्म का पालन करने से बल अवश्य प्राप्त होगा, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; इसलिए संकटकाल में अधर्म भी धर्म ही सुना जाता है। किन्तु विद्वान पुरुष यह मानते हैं कि संकटकाल में भी धर्म के विरुद्ध आचरण करने से अधर्म निश्चय ही अधर्म ही है।॥ 15-16॥
 
A weak man, even after attaining Dharma, is unable to earn a just livelihood. It cannot be said with certainty that by following Dharma one will definitely gain strength; therefore, in times of crisis, even Adharma is heard to be Dharma. But learned men believe that even in times of crisis, by behaving against Dharma, Adharma is definitely Adharma.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)