श्लोक 1: युधिष्ठिर ने पूछा, "भारत! यदि राजा के शत्रु बढ़ जाएँ, उसके मित्र उसका साथ छोड़ दें, तथा उसकी सेना और कोष नष्ट हो जाएँ, तो उसके लिए कौन-सा मार्ग कल्याणकारी होगा?"
श्लोक 2: जो अच्छी सलाह से भ्रष्ट हो चुका है और राज्य द्वारा भ्रष्ट होने की संभावना है तथा जो अपनी उन्नति के लिए कोई अच्छा रास्ता नहीं देखता, जिसकी सहायता केवल दुष्ट मंत्री ही करता है, उसका क्या कर्तव्य है?
श्लोक 3: यदि कोई शक्तिशाली राजा उस पर आक्रमण करके शत्रु के राज्य को कुचल दे, तो उससे युद्ध करते समय दुर्बल राजा को क्या शरण मिलेगी? ॥3॥
श्लोक 4: जिसने अपने राज्य की रक्षा नहीं की, जिसे देश और काल का ज्ञान नहीं है, जिसके लिए अत्यन्त दुःख के कारण शांति या छल की नीति का प्रयोग करना असम्भव है, उसे क्या करना चाहिए? उसे अपने प्राणों की रक्षा करनी चाहिए या अपने धन की? उसके लिए क्या करना उचित है?॥4॥
श्लोक 5: भीष्म बोले, "धर्मपुत्र! भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने मुझसे अत्यन्त गोपनीय बात पूछी है। यदि तुमने यह प्रश्न न पूछा होता, तो मैं इस संकट के समय धर्म के विषय में कुछ भी न कह पाता।"
श्लोक 6: हे भारतभूषण! धर्म का विषय अत्यंत सूक्ष्म है, शास्त्रों के आचरण से उसे समझा जा सकता है। शास्त्रों को सुनकर, अपने सदाचार द्वारा उसका सेवन करने वाला तथा साधु जीवन जीने वाला कोई विरला ही होता है। 6॥
श्लोक 7: बुद्धि से काम करने पर मनुष्य धनवान हो भी सकता है और नहीं भी। ऐसे प्रश्नों पर अपनी बुद्धि से विचार करके फिर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए ॥7॥
श्लोक 8: हे भारत! उपर्युक्त संकट के समय मैं राजाओं के प्राणों की रक्षा के लिए एक ऐसा उपाय बता रहा हूँ, जिसमें धर्म की प्रचुरता है। इसे ध्यानपूर्वक सुनो। किन्तु मैं धर्म पालन के लिए ऐसे धर्म को अपनाना नहीं चाहता।
श्लोक 9: यदि संकटकाल में भी प्रजा को कष्ट देकर धन संग्रह किया जाए, तो वह आगे चलकर राजा के लिए विनाशक सिद्ध होता है। शरण लेने योग्य सभी बुद्धिजनों का यही निश्चय है॥9॥
श्लोक 10: जैसे-जैसे मनुष्य प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन करता है, उसका ज्ञान बढ़ता जाता है और फिर वह विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करने में रुचि लेने लगता है ॥10॥
श्लोक 11: ज्ञान के अभाव में मनुष्य संकट से बचने का कोई उपयुक्त उपाय नहीं सोच पाता; किन्तु ज्ञान होने पर वह उपाय ज्ञात हो जाता है। उचित मार्ग ही समृद्धि बढ़ाने का सर्वोत्तम उपाय है॥11॥
श्लोक 12: मेरे वचनों में संदेह न करके और अपनी आलोचना का त्याग करके इस उपदेश को सुनो। राजा की शक्ति का नाश उसके कोष के नाश से होता है ॥12॥
श्लोक 13: जैसे मनुष्य सूखे स्थान से भी खुदाई करके जल निकाल सकता है, वैसे ही संकट के समय राजा को चाहिए कि अपनी दीन प्रजा से यथासम्भव धन लेकर अपना कोष बढ़ाए। फिर जब अच्छा समय आए, तो उस धन से प्रजा पर उपकार करे। यही धर्म अनादि काल से चला आ रहा है। पूर्व राजाओं ने भी संकट के समय यही उपाय पाकर इसका पालन किया है॥13॥
श्लोक 14: भारत! बलवानों का धर्म अलग होता है और संकटग्रस्त पुरुषों का धर्म अलग होता है। इसलिए राजा को पहले धन संचय करके ही धर्म का पालन करने का अवसर मिलता है; क्योंकि जीविका के साधन जुटाना धर्म से भी बड़ा है॥ 14॥
श्लोक 15-16: दुर्बल मनुष्य धर्म को प्राप्त करके भी न्यायोचित जीविका नहीं कमा पाता। धर्म का पालन करने से बल अवश्य प्राप्त होगा, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; इसलिए संकटकाल में अधर्म भी धर्म ही सुना जाता है। किन्तु विद्वान पुरुष यह मानते हैं कि संकटकाल में भी धर्म के विरुद्ध आचरण करने से अधर्म निश्चय ही अधर्म ही है।॥ 15-16॥
श्लोक 17: संकट दूर होने पर क्षत्रिय को क्या करना चाहिए? क्या उसे तपस्या करनी चाहिए या प्रजा से कर लेना बंद कर देना चाहिए? यह शंका उत्पन्न होती है। इसका समाधान यह है कि उसे ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे उसके धर्म की हानि न हो और उसे शत्रु के अधीन न होना पड़े। विद्वानों ने यही उसका कर्तव्य बताया है कि वह अपने आप को किसी भी प्रकार संकट में न डाले॥17॥
श्लोक 18: संकट के समय मनुष्य को न तो अपने धर्म की ओर देखना चाहिए और न ही दूसरों के धर्म की ओर; बल्कि उसे तो पूरे मन से किसी भी प्रकार से अपने ही उद्धार की इच्छा करनी चाहिए; यही सबका निश्चय है ॥18॥
श्लोक 19: पिताश्री! जिस प्रकार धर्म को जानने वाले पुरुष का निश्चय ही धर्म के विषय में उसकी कुशलता का सूचक है, उसी प्रकार शारीरिक बल द्वारा अपने को आगे बढ़ाने का प्रयत्न ही क्षत्रिय की कुशलता का सूचक है; यह श्रुतिका का निर्णय है॥19॥
श्लोक 20: हे भरतपुत्र! यदि क्षत्रिय की जीविका छिन जाए, तो वह तपस्वी और ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी का धन नहीं ले सकता (अर्थात् वह सबका ले सकता है)।॥20॥
श्लोक 21: जैसे जीविका के अभाव में दुःखी होने पर ब्राह्मण किसी अयोग्य व्यक्ति से भी यज्ञ करवा सकता है और प्राण बचाने के लिए अभक्ष्य अन्न भी खा सकता है, वैसे ही क्षत्रिय के लिए भी यह कर्तव्य बताया गया है (पूर्व श्लोक में)। इसमें संशय नहीं है॥21॥
श्लोक 22: संकटग्रस्त मनुष्य के लिए कौन-सा द्वार नहीं खुला रहता? (जिस मार्ग से वह बच निकलता है, वही उसके लिए द्वार है।) कैदी के लिए सबसे बुरा मार्ग कौन-सा है? (यदि वह बिना मार्ग के भी बच सकता है, तो ऐसा करने का प्रयत्न कर सकता है।) जब मनुष्य संकटों से घिरा होता है, तो वह बिना द्वार के भी बच निकलता है।॥22॥
श्लोक 23: उपर्युक्त बातें उस क्षत्रिय के लिए कही गई हैं जो धन और सेना के अभाव में समस्त प्रजा से पराजित होने की संभावना रखता हो। क्षत्रिय के लिए भिक्षा मांगकर वैश्य या शूद्र की जीविका अपनाने का कोई विधान नहीं है। 23॥
श्लोक 24: परन्तु जब कोई अपनी जाति के लिए प्रतिपादित धर्म का पालन करके जीविका नहीं चला सकता, तब उसके लिए स्वधर्म के विपरीत वृत्ति भी बताई गई है। क्योंकि संकटकाल में प्रथम कल्प की वृत्ति अर्थात् स्वधर्मानुसार वृत्ति का त्याग करने वाले मनुष्य के लिए अपने से निम्न वर्ण की वृत्ति से जीविका चलाने का प्रावधान है। 24॥
श्लोक 25: संकटग्रस्त मनुष्य धर्म के विरुद्ध आचरण करके भी जीवित रह सकता है। जीविका के अभाव में ब्राह्मणों में ऐसा ही आचरण देखा गया है॥ 25॥
श्लोक 26: फिर क्षत्रिय के विषय में संशय कैसे हो सकता है? उसके लिए यह सदैव निश्चित है कि संकट के समय उसे विशिष्ट जनों से अर्थात् धनवानों से बलपूर्वक धन लेना ही होगा। धन के अभाव में उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना होगा॥ 26॥
श्लोक 27: विद्वान पुरुष क्षत्रियों को प्रजा का रक्षक और संहारक दोनों मानते हैं। अतः क्षत्रिय भाई को प्रजा की रक्षा करते हुए ही धन ग्रहण करना चाहिए॥27॥
श्लोक 28: राजन! इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसका स्वभाव हिंसा से रहित हो। अन्यों की तो बात ही छोड़िए, वन में एकान्त निवास करने वाले तपस्वी ऋषि का स्वभाव भी हिंसा से पूर्णतः रहित नहीं है।
श्लोक 29: हे कुरुश्रेष्ठ! केवल अपने माथे पर लिखे वेतन पर निर्भर रहकर कोई जीवित नहीं रह सकता; अतः जो राजा अपनी प्रजा की रक्षा करना चाहता है, उसके लिए भाग्य पर निर्भर रहकर जीवित रहना सर्वथा असम्भव है।
श्लोक 30: अतः संकट के समय राजा और प्रजा दोनों को एक दूसरे की निरन्तर रक्षा करनी चाहिए। यही सदैव धर्म है ॥30॥
श्लोक 31: जैसे राजा विपत्ति आने पर बहुत सारा धन खर्च करके भी अपनी प्रजा की रक्षा करता है, वैसे ही जब राजा विपत्ति में पड़ जाए तो प्रजा को भी उसकी रक्षा करनी चाहिए ॥31॥
श्लोक 32: राजा चाहे भूख से पीड़ित हो अथवा जीविका चलाने में कठिनाई महसूस कर रहा हो, तो भी उसे अपने राज्य से कोष, राजकर्मचारी, सेना, मित्र तथा अन्य संचित साधन कभी नहीं निकालने चाहिए ॥ 32॥
श्लोक 33: धार्मिक लोग कहते हैं कि मनुष्य को अपने भोजन के लिए संग्रहित अन्न में से भी बीज बचाकर रखना चाहिए। महामायावी शम्बरासुर का भी इस विषय में यही मत बताया गया है ॥33॥
श्लोक 34: जिस राजा की प्रजा और उसके राज्य में आने वाले विदेशी लोग जीविका के बिना कष्ट सह रहे हों, उसके जीवन को धिक्कार है ॥34॥
श्लोक 35: राजा का मूल उसकी सेना और कोष है। इनमें से भी सेना का मूल कोष है। सेना ही समस्त धर्मों की रक्षा का मूल है और धर्म ही प्रजा का मूल है॥ 35॥
श्लोक 36: दूसरों को कष्ट दिए बिना धन संग्रह नहीं किया जा सकता; और धन संग्रह किए बिना सेना कैसे एकत्र की जा सकती है? इसलिए संकट के समय यदि राजा धन या कोष संग्रह के लिए अपनी प्रजा को कष्ट भी देता है, तो भी वह दोषी नहीं हो सकता॥ 36॥
श्लोक 37: जैसे यज्ञ के अनुष्ठान में जो करने योग्य नहीं है, वह भी यज्ञ के निमित्त किया जाता है (परन्तु वह दोषपूर्ण नहीं माना जाता)। उसी प्रकार संकट के समय प्रजा को कष्ट देने से राजा को दोष नहीं लगता ॥37॥
श्लोक 38: संकट के समय प्रजा को कष्ट देना लाभदायक है क्योंकि इससे धन-संचय में सहायता मिलती है। इसके विपरीत, उन्हें कष्ट न देना हानिकारक हो जाता है। इसी प्रकार, युद्ध का संकट आने पर अन्य हानिकारक कार्य (सेना आदि एकत्रित करना जिससे व्यय बढ़ता है) भी लाभदायक (विजय प्राप्ति में सहायक) सिद्ध होते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति को इस प्रकार विचार करके अपने कर्तव्य का निश्चय करना चाहिए। 38
श्लोक 39: जैसे यज्ञ की सफलता के लिए अन्य सभी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, उत्तम यज्ञ किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाता है, वैसे ही यज्ञ से संबंधित अन्य सभी वस्तुएं भी किसी विशेष उद्देश्य की सफलता के लिए उपयोग की जाती हैं और ये सभी यज्ञ करने के साधन मात्र हैं ॥39॥
श्लोक 40-41: अब मैं तुम्हें एक ऐसी उपमा सुनाता हूँ जिससे धर्म का सार प्रकट हो जाएगा। ब्राह्मण यज्ञ के लिए 'यूप' बनाने के उद्देश्य से वृक्ष को काटते हैं। वे वृक्ष को काटने और उसे बाहर निकालने में आने वाले सभी समीपवर्ती वृक्षों को अवश्य काटते हैं। वे वृक्ष गिरते समय प्रायः अन्य वनस्पतियों को भी तोड़ देते हैं ॥40-41॥
श्लोक 42: परंतु जब तक मैं उन लोगों को न मार डालूँ जो (प्रजा की रक्षा के लिए बनाए गए) महान कोष के संग्रह में विघ्न डालते हैं, तब तक मुझे इस कार्य में कोई सफलता नहीं दिखाई देती। ॥42॥
श्लोक 43: धन से मनुष्य इहलोक और परलोक दोनों को जीत लेता है तथा सत्य और धर्म को भी प्राप्त कर लेता है, परन्तु दरिद्र मनुष्य इन कार्यों में ऐसी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता। उसका अस्तित्व प्रायः नगण्य ही होता है ॥ 43॥
श्लोक 44: हे भरतपुत्र! यज्ञ करने के उद्देश्य से मनुष्य को सभी प्रकार से धन का संग्रह करना चाहिए; इस प्रकार करने योग्य या न करने योग्य कर्मों के होने पर भी अन्य प्रकार से कर्ता को दोष नहीं लगता ॥ 44॥
श्लोक 45: हे राजन! हे पृथ्वी के स्वामी! धन का संचय और उसका त्याग - ये दोनों एक ही व्यक्ति में किसी भी प्रकार से एक साथ नहीं रह सकते; क्योंकि मैं वन में रहने वाले त्यागी महात्माओं को धन में श्रेष्ठ नहीं देखता।
श्लोक 46: यहाँ इस पृथ्वी पर जो भी धन दिखाई देता है, ‘वह मेरा हो, वह मेरा हो’, ऐसी सभी लोगों की इच्छा होती है ॥ 46॥
श्लोक 47: परन्तु राजा के लिए अपने राज्य की रक्षा के समान कोई अन्य कर्तव्य नहीं है। अभी जिस कर्तव्य की चर्चा की गई है, वह केवल संकट के समय ही राजाओं पर लागू होता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 48: कुछ लोग दान से, कुछ लोग यज्ञ करके, कुछ तपस्वी लोग तपस्या करके, कुछ लोग बुद्धि से तथा कई अन्य लोग कौशल से धन कमाते हैं।
श्लोक 49: गरीब को कमज़ोर समझा जाता है। धन मनुष्य को बलवान बनाता है। धनवान को सब कुछ आसानी से मिल जाता है। जिसके पास धन है, वह सभी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 50: धन संचय करने से ही धर्म, काम, इहलोक और परलोक की प्राप्ति होती है। उस धन को केवल धर्म से ही प्राप्त करने की इच्छा करनी चाहिए, अधर्म से कभी नहीं।॥50॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥