श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 13: सहदेवका युधिष्ठिरको ममता और आसक्तिसे रहित होकर राज्य करनेकी सलाह देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.13.2 
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेष्वनुगृध्यत:।
यो धर्मो यत् सुखं वा स्याद् द्विषतां तत् तथास्तु न:॥ २॥
 
 
अनुवाद
जो लोग बाह्य भौतिक पदार्थों से दूर रहते हैं और शारीरिक सुखों में आसक्त रहते हैं, उन्हें जो धर्म या सुख प्राप्त होता है, वही हमारे शत्रुओं को भी उसी रूप में प्राप्त हो। ॥2॥
 
Whatever Dharma (righteousness) or happiness is attained by those who stay away from external material things and are attached to bodily pleasures, may it be attained by our enemies in that form only. ॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)