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श्लोक 12.129.9  |
गौतम उवाच
मातापितृभ्यामानृण्यं किं कृत्वा समवाप्नुयात्।
कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभान् शुचीन्॥ ९॥ |
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| अनुवाद |
| तब गौतम बोले - हे प्रभु ! मनुष्य किस कर्म से माता-पिता का ऋणमुक्त हो सकता है ? तथा उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकों की प्राप्ति कैसे होती है ? |
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| Then Gautam said – Lord! By what action can a person become indebted to his parents? And how does he attain rare and sacred worlds? 9॥ |
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