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mahabharat 12.128.9: ऋषि बोले, "हे मनुष्यों के स्वामी! आशा की दुर्बलता या आशावान की दुर्बलता के समान कोई दुर्बलता नहीं है। आशा की वस्तु दुर्लभ होने के कारण मैंने अनेक राजाओं से याचना की है।   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.128.9 
ऋषिरुवाच
कृशत्वेन समं राजन्नाशाया विद्यते नृप।
तस्या वै दुर्लभत्वाच्च प्रार्थिता: पार्थिवा मया॥ ९॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले, "हे मनुष्यों के स्वामी! आशा की दुर्बलता या आशावान की दुर्बलता के समान कोई दुर्बलता नहीं है। आशा की वस्तु दुर्लभ होने के कारण मैंने अनेक राजाओं से याचना की है।
 
The sage said, "O Lord of men! There is no weakness like the weakness of hope or the weakness of the hopeful. I have begged many kings because of the rarity of the thing that is hoped for.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)