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त्वं हि प्रष्टा च श्रोता च कृच्छ्रेष्वनुगतेष्विह।
श्रुत्वा मम महाराज न संतप्तुमिहार्हसि॥ २७॥
अनुवाद
महाराज! ऐसी कठिन परिस्थिति में भी आप उचित प्रश्न पूछते हैं और उचित उत्तर सुनते हैं; अतः आपको इस बात से दुःख नहीं होना चाहिए कि दुर्योधन के साथ संधि नहीं हो सकी॥ 27॥
Maharaj! Even in such a difficult situation, you ask appropriate questions and hear appropriate answers; therefore, you should not be upset over the fact that a treaty could not be reached with Duryodhan.॥ 27॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥