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mahabharat 12.128.2: हे निष्पाप ब्राह्मण! मेरा एक ही पुत्र था। वह भी बालक ही था। मैं इस वन में कहीं दिखाई नहीं दे रहा हूँ। उसे ढूँढ़ने के लिए मैं सर्वत्र भटक रहा हूँ॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.128.2 
एक: पुत्र: स विप्राग्रॺ बाल एव च मेऽनघ।
न दृश्यते वने चास्मिंस्तमन्वेष्टुं चराम्यहम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप ब्राह्मण! मेरा एक ही पुत्र था। वह भी बालक ही था। मैं इस वन में कहीं दिखाई नहीं दे रहा हूँ। उसे ढूँढ़ने के लिए मैं सर्वत्र भटक रहा हूँ॥ 2॥
 
O sinless Brahmin! I had only one son. He was also a child. I am nowhere to be seen in this forest. I am wandering everywhere to find him.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)