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mahabharat 12.128.16: जब एकलौते पुत्र का पिता खो जाता है या परदेश चला जाता है और उसे अपने पुत्र का कोई समाचार नहीं मिलता, तब उसके हृदय में जो आशा शेष रहती है, वह मुझसे भी अधिक दुर्बल होती है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.128.16 
एकपुत्र: पिता पुत्रे नष्टे वा प्रोषितेऽपि वा।
प्रवृत्तिं यो न जानाति साऽऽशा कृशतरी मया॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जब एकलौते पुत्र का पिता खो जाता है या परदेश चला जाता है और उसे अपने पुत्र का कोई समाचार नहीं मिलता, तब उसके हृदय में जो आशा शेष रहती है, वह मुझसे भी अधिक दुर्बल होती है ॥16॥
 
When the father of an only son is lost or has gone abroad and he has no news of his son, the hope that remains in his heart is even more fragile than mine. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)