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mahabharat 12.128.15: कृतघ्न, क्रूर, आलसी और दूसरों को हानि पहुँचाने वाले मनुष्यों में जो आशा रहती है, वह (क्योंकि वह कभी पूरी नहीं होती और चिन्ता के कारण उन्हें दुर्बल बना देती है; इसलिए) मुझसे भी अधिक दुर्बल है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.128.15 
कृतघ्नेषु च या सक्ता नृशंसेष्वलसेषु च।
अपकारिषु चासक्ता साऽऽशा कृशतरी मया॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कृतघ्न, क्रूर, आलसी और दूसरों को हानि पहुँचाने वाले मनुष्यों में जो आशा रहती है, वह (क्योंकि वह कभी पूरी नहीं होती और चिन्ता के कारण उन्हें दुर्बल बना देती है; इसलिए) मुझसे भी अधिक दुर्बल है ॥15॥
 
The hope that exists in ungrateful, cruel, lazy and those who harm others is (as it never gets fulfilled and makes them weak due to worry; hence it) even more feeble than me. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)