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mahabharat 12.128.14: जब कोई मनुष्य साधक का स्वागत करके उसे आशा देकर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी सहायता नहीं करता, तब समस्त प्राणियों के मन में उत्पन्न होने वाली आशा मुझसे भी क्षीण हो जाती है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.128.14 
सत्कृत्य नोपकुरुते परं शक्त्या यथार्हत:।
या सक्ता सर्वभूतेषु साऽऽशा कृशतरी मया॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब कोई मनुष्य साधक का स्वागत करके उसे आशा देकर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी सहायता नहीं करता, तब समस्त प्राणियों के मन में उत्पन्न होने वाली आशा मुझसे भी क्षीण हो जाती है ॥14॥
 
When a man, after welcoming a seeker and giving him hope, does not help him according to his capacity, then the hope that arises in the mind of all beings becomes even weaker than me. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)