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mahabharat 12.128.10: राजा ने कहा- ब्राह्मण! मैंने तुम्हारे वचनों से यह भली-भाँति समझ लिया है कि जो आशा से बँधा हुआ है, वह दुर्बल है और जिसने आशा को जीत लिया है, वह बलवान है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे वचनों को वैदिक कहावत मानकर स्वीकार कर लिया है कि जिस वस्तु की आशा की जाती है, वह अत्यंत दुर्लभ है॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 128: तनु मुनिका राजा वीरद्युम्नको आशाके स्वरूपका परिचय देना और ऋषभके उपदेशसे सुमित्रका आशाको त्याग देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.128.10 
राजोवाच
कृशाकृशे मया बह्मन् गृहीते वचनात् तव।
दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज॥ १०॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा- ब्राह्मण! मैंने तुम्हारे वचनों से यह भली-भाँति समझ लिया है कि जो आशा से बँधा हुआ है, वह दुर्बल है और जिसने आशा को जीत लिया है, वह बलवान है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मैंने तुम्हारे वचनों को वैदिक कहावत मानकर स्वीकार कर लिया है कि जिस वस्तु की आशा की जाती है, वह अत्यंत दुर्लभ है॥10॥
 
The king said-Brahmin! I have understood very well from your words that the one who is bound by hope is weak and the one who has conquered hope is strong. O best of Brahmins! I have accepted your words as a Vedic saying that the thing which is hoped for is very rare.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)