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श्लोक  12.127.20 
दुर्लभं किं नु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत्।
ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यं न ते मयि॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे देवमुनि! दुर्लभ क्या है? और आशा से बढ़कर क्या है? यदि आपकी दृष्टि में यह बात मुझसे छिपाने योग्य नहीं है, तो कृपया मुझे यह बताइए।'
 
'O sage of gods! What is rare? And what is greater than hope? If in your view this thing is not worth hiding from me, then please tell me this.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)