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mahabharat 12.126.13-14: आशा की तुलना विशाल पर्वत हिमालय या अथाह सागर से नहीं की जा सकती। हे तपस्वियों! जैसे आकाश का अन्त नहीं है, वैसे ही मेरी आशा का भी अन्त नहीं है। आप सब कुछ जानते हैं, क्योंकि तपस्वी मुनि सर्वज्ञ हैं।॥13-14॥   |   mahabharat अध्याय 12.126: राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 126: राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  12.126.13-14 
हिमवान् वा महाशैल: समुद्रो वा महोदधि:।
महत्त्वान्नान्वपद्येतां नभसो वान्तरं तथा॥ १३॥
आशायास्तपसि श्रेष्ठास्तथा नान्तमहं गत:।
भवतां विदितं सर्वं सर्वज्ञा हि तपोधना:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
आशा की तुलना विशाल पर्वत हिमालय या अथाह सागर से नहीं की जा सकती। हे तपस्वियों! जैसे आकाश का अन्त नहीं है, वैसे ही मेरी आशा का भी अन्त नहीं है। आप सब कुछ जानते हैं, क्योंकि तपस्वी मुनि सर्वज्ञ हैं।॥13-14॥
 
‘The mighty mountain Himalaya or the unfathomable ocean cannot match hope in their vastness. O great ascetics! Just as the sky has no end, similarly I have no end to hope. You know everything because ascetic sages are omniscient.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)