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mahabharat 12.125.7: हे कुरुश्रेष्ठ! वह अकल्पनीय और अत्यंत दुर्लभ है - उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ और दुर्गम होने के कारण ही मैं उसे इतना महान देखता और मानता हूँ। भला, आशा से बढ़कर दुर्लभ और क्या है?॥ 7॥   |   mahabharat अध्याय 12.125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.125.7 
एषा चैव कुरुश्रेष्ठ दुर्विचिन्त्या सुदुर्लभा।
दुर्लभत्वाच्च पश्यामि किमन्यद् दुर्लभं तत:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! वह अकल्पनीय और अत्यंत दुर्लभ है - उसे जीतना कठिन है। उसके दुर्लभ और दुर्गम होने के कारण ही मैं उसे इतना महान देखता और मानता हूँ। भला, आशा से बढ़कर दुर्लभ और क्या है?॥ 7॥
 
Best of the Kurus! He is inconceivable and extremely rare - it is difficult to conquer him. It is because of his being rare and difficult to conquer that I see and consider him so great. Well, what is more rare than hope?॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)