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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 125: युधिष्ठिरका आशाविषयक प्रश्न—उत्तरमें राजा सुमित्र और ऋषभ नामक ऋषिके इतिहासका आरम्भ, उसमें राजा सुमित्रका एक मृगके पीछे दौड़ना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.125.6 
आशां महत्तरां मन्ये पर्वतादपि सद्रुमात्।
आकाशादपि वा राजन्नप्रमेयैव वा पुन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मेरा मानना ​​है कि आशा, वृक्ष सहित पर्वत से भी बड़ी है, या फिर वह आकाश से भी बड़ी और अथाह है।
 
King! I believe hope to be greater than even a mountain with a tree or it is greater than the sky and immeasurable.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)