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श्लोक  12.124.68 
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि।
शीलं समासेनैतत् ते कथितं कुरुसत्तम॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को जो कार्य करना चाहिए, उसे उसी प्रकार करना चाहिए जिस प्रकार सभा में उसकी प्रशंसा की जाती है। कुरुश्रेष्ठ! यह शीलका स्वरूप तुम्हें संक्षेप में बताया गया है। 68॥
 
The work that a person does should be done in the same manner in which he is praised in a gathering. Kurushrestha! This has been briefly described to you as Sheelka's form. 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)