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mahabharat 12.124.4-6: भीष्म बोले, "हे दूसरों को सम्मान देने वाले राजन! भरतपुत्र! पूर्वकाल में इन्द्रप्रस्थ में (राजसूय यज्ञ के समय) आपके भाइयों सहित आपकी अद्भुत धन-सम्पत्ति, उस उत्तम सभा और समृद्धि को देखकर दुर्योधन व्यथित हो गया था। कौरवों की सभा में बैठे हुए दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से अपनी गहरी चिंता प्रकट की और उन्हें अपनी पूरी व्यथा सुनाई। सभा में उन्होंने जो कुछ कहा, उसे सुनो।   |   mahabharat अध्याय 12.124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन  »  श्लोक 4-6
 
 
श्लोक  12.124.4-6 
भीष्म उवाच
पुरा दुर्योधनेनेह धृतराष्ट्राय मानद।
आख्यातं तप्यमानेन श्रियं दृष्ट्वा तथागताम्॥ ४॥
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह।
सभायां चाह वचनं तत् सर्वं शृणु भारत॥ ५॥
भवतस्तां सभां दृष्ट्वा समृद्धिं चाप्यनुत्तमाम्।
दुर्योधनस्तदाऽऽसीन: सर्वं पित्रे न्यवेदयत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "हे दूसरों को सम्मान देने वाले राजन! भरतपुत्र! पूर्वकाल में इन्द्रप्रस्थ में (राजसूय यज्ञ के समय) आपके भाइयों सहित आपकी अद्भुत धन-सम्पत्ति, उस उत्तम सभा और समृद्धि को देखकर दुर्योधन व्यथित हो गया था। कौरवों की सभा में बैठे हुए दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से अपनी गहरी चिंता प्रकट की और उन्हें अपनी पूरी व्यथा सुनाई। सभा में उन्होंने जो कुछ कहा, उसे सुनो।
 
Bhishma said, "O King who gives respect to others! Son of Bharat! Earlier in Indraprastha (at the time of Rajsuya Yagya) Duryodhan was distressed after seeing your wonderful wealth and prosperity along with your brothers, that excellent assembly and prosperity. Sitting in the Kaurava assembly, Duryodhan expressed his deep concern to his father Dhritarashtra and told him his entire agony. Listen to all the things he said in the assembly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)