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mahabharat 12.124.34: प्रह्लाद बोले, "हे ब्राह्मण! मैं राजा होने के कारण अभिमानवश कभी ब्राह्मणों की निन्दा नहीं करता। बल्कि जब वे मुझे शुक्रनीति के सिद्धांतों का उपदेश देते हैं, तो मैं संयमपूर्वक उनकी बात सुनता हूँ और उनके उपदेशों का पालन करता हूँ।" 34.   |   mahabharat अध्याय 12.124: इन्द्र और प्रह्लादकी कथा—शीलका प्रभाव, शीलके अभावमें धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मीके न रहनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.124.34 
प्रह्राद उवाच
नासूयामि द्विजान् विप्र राजास्मीति कदाचन।
काव्यानि वदतां तेषां संयच्छामि वहामि च॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
प्रह्लाद बोले, "हे ब्राह्मण! मैं राजा होने के कारण अभिमानवश कभी ब्राह्मणों की निन्दा नहीं करता। बल्कि जब वे मुझे शुक्रनीति के सिद्धांतों का उपदेश देते हैं, तो मैं संयमपूर्वक उनकी बात सुनता हूँ और उनके उपदेशों का पालन करता हूँ।" 34.
 
Prahlada said, "O Brahmin! I never criticise Brahmins out of pride because I am a king. Rather, when they give me instructions on the principles of Shukrniti, I listen to them with restraint and follow their instructions." 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)