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श्लोक  12.124.18 
दुर्योधन उवाच
कथं तत् प्राप्यते शीलं श्रोतुमिच्छामि भारत।
येन शीलेन तै: प्राप्ता क्षिप्रमेव वसुन्धरा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन ने पूछा, "भरत! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि वह पुण्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है, जिसके द्वारा उन राजाओं ने शीघ्र ही संसार का राज्य प्राप्त कर लिया।" 18.
 
Duryodhana asked, "Bharata! I wish to hear how one can attain that virtue by which those kings soon gained the kingdom of the world." 18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)