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mahabharat 12.123.8: यदि कोई आसक्ति और फल की इच्छा को त्यागकर तीनों गुणों का पालन करे, तो उसका फल कल्याण ही होता है। यदि कोई व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, तो यह बड़े सौभाग्य की बात है। धन प्राप्ति के लिए समझ-बूझकर धार्मिक अनुष्ठान करने पर भी कभी वह प्राप्त होता है और कभी नहीं होता। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.123: त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.123.8 
श्रेष्ठे बुद्धिस्त्रिवर्गस्य यदयं प्राप्नुयान्नर:।
कर्मणा बुद्धिपूर्वेण भवत्यर्थो न वा पुन:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई आसक्ति और फल की इच्छा को त्यागकर तीनों गुणों का पालन करे, तो उसका फल कल्याण ही होता है। यदि कोई व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, तो यह बड़े सौभाग्य की बात है। धन प्राप्ति के लिए समझ-बूझकर धार्मिक अनुष्ठान करने पर भी कभी वह प्राप्त होता है और कभी नहीं होता। ॥8॥
 
If one follows the three virtues by abandoning attachment and desire for results, then it ends in welfare only. If a person is able to achieve it, then it is a matter of great fortune. Even after performing religious rituals with understanding for the attainment of wealth, sometimes it is achieved and sometimes it is not. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)