Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.123.7: इन धर्मों आदि का सेवन उसी रूप में करना चाहिए जिस रूप में ये हितकर हों अर्थात् अपना वास्तविक हित करने वाले हों, अर्थात् कल्याण के साधन के रूप में ही इनका उपयोग करना चाहिए। यदि मन से भी इनका त्याग न हो, तो शरीर से, रूप से इनका त्याग करना तो दूर की बात है। तप या विचार से ही इनसे अपने को मुक्त रखना चाहिए, अर्थात् आसक्ति और फल का त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। 7॥ | mahabharat अध्याय 12.123: त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
संनिकृष्टांश्चरेदेतान् न चैतान् मनसा त्यजेत्।
विमुक्तस्तपसा सर्वान् धर्मादीन् कामनैष्ठिकान्॥ ७॥
अनुवाद
इन धर्मों आदि का सेवन उसी रूप में करना चाहिए जिस रूप में ये हितकर हों अर्थात् अपना वास्तविक हित करने वाले हों, अर्थात् कल्याण के साधन के रूप में ही इनका उपयोग करना चाहिए। यदि मन से भी इनका त्याग न हो, तो शरीर से, रूप से इनका त्याग करना तो दूर की बात है। तप या विचार से ही इनसे अपने को मुक्त रखना चाहिए, अर्थात् आसक्ति और फल का त्याग करके ही इन सब धर्म, अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए। 7॥
These religions etc. should be consumed in the same form in which they are beneficial i.e. serve one's real benefit, that is, they should be used only as a means of welfare. Even if one does not renounce them through the mind, then it is a distant thing to renounce them through the body through the form. One should keep oneself free from them only through penance or thought, that is, one should consume all these dharma, artha and kama only after renouncing attachment and fruit. 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥