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mahabharat 12.123.22: उसे जल में खड़े होकर गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। उसे सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। उसे अपने राज्य से पापियों को निकाल देना चाहिए और धर्मात्मा पुरुषों की संगति करनी चाहिए। 22.   |   mahabharat अध्याय 12.123: त्रिवर्गका विचार तथा पापके कारण पदच्युत हुए राजाके पुनरुत्थानके विषयमें आंगरिष्ठ और कामन्दकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.123.22 
जपेदुदकशील: स्यात् सततं सुखमास्थित:।
धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहि: कृत्वेह दुष्कृतीन्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
उसे जल में खड़े होकर गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। उसे सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। उसे अपने राज्य से पापियों को निकाल देना चाहिए और धर्मात्मा पुरुषों की संगति करनी चाहिए। 22.
 
He should stand in water and chant Gayatri Mantra. He should always remain happy. He should expel the sinners from his kingdom and should associate with the righteous men. 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)