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mahabharat 12.122.3-4: राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय सुमेरु पर्वत के निकट हिमालय की चोटी पर है, जहाँ परशुरामजी ने मुंजवत में अपनी जटाएँ बाँधने की आज्ञा दी थी। तभी से कठोर व्रत का पालन करने वाले ऋषियों ने रुद्र द्वारा सेवित उस क्षेत्र का नाम मुंजपक्षेत्र रखा। 3-4॥   |   mahabharat अध्याय 12.122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  12.122.3-4 
तत्र शृङ्गे हिमवतो मेरौ कनकपर्वते।
यत्र मुञ्जावटे रामो जटाहरणमादिशत्॥ ३॥
तदाप्रभृति राजेन्द्र ऋषिभि: संशितव्रतै:।
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्त: स देशो रुद्रसेवित:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय सुमेरु पर्वत के निकट हिमालय की चोटी पर है, जहाँ परशुरामजी ने मुंजवत में अपनी जटाएँ बाँधने की आज्ञा दी थी। तभी से कठोर व्रत का पालन करने वाले ऋषियों ने रुद्र द्वारा सेवित उस क्षेत्र का नाम मुंजपक्षेत्र रखा। 3-4॥
 
Rajendra! That place is on the peak of the Himalayas near the golden mountain Sumeru, where Parashuramji had ordered to tie his locks in Munjavat. Since then, the sages who followed a strict fast named that region served by Rudra as Munjapshtra. 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)