श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन  » 
 
 
अध्याय 122: दण्डकी उत्पत्ति तथा उसके क्षत्रियोंके हाथमें आनेकी परम्पराका वर्णन
 
श्लोक 1:  भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! जो लोग इस दण्ड की उत्पत्ति के विषय में जानते हैं, वे एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं। उसे भी तुम्हें सुनना चाहिए। अंगदेश में वसुहोम नामक एक प्रसिद्ध एवं प्रतापी राजा राज्य करते थे॥1॥
 
श्लोक 2:  एक समय की बात है, वे महान तपस्वी और धर्मात्मा राजा अपनी पत्नी के साथ देवताओं, ऋषियों और पितरों द्वारा पूजित मुंजपृष्ठ नामक तीर्थस्थान पर आए॥ 2॥
 
श्लोक 3-4:  राजेन्द्र! वह स्थान सुवर्णमय सुमेरु पर्वत के निकट हिमालय की चोटी पर है, जहाँ परशुरामजी ने मुंजवत में अपनी जटाएँ बाँधने की आज्ञा दी थी। तभी से कठोर व्रत का पालन करने वाले ऋषियों ने रुद्र द्वारा सेवित उस क्षेत्र का नाम मुंजपक्षेत्र रखा। 3-4॥
 
श्लोक 5:  वहाँ वे वेदों में वर्णित अनेक गुणों से संपन्न होकर तपस्या करने लगे। उस तपस्या के प्रभाव से वे देवताओं के समान हो गए। ब्राह्मणों में उनका बड़ा सम्मान होने लगा। 5॥
 
श्लोक 6:  एक दिन राजा मान्धाता, इन्द्र के उदार एवं सम्मानित मित्र शत्रुघ्न, उनसे मिलने आये।
 
श्लोक 7:  महान तपस्वी राजा वसुहोम के पास पहुँचकर और उनसे मिलकर राजा मान्धाता उनके समक्ष विनम्रतापूर्वक खड़े हो गए।
 
श्लोक 8:  वसुहोम ने भी राजा को जल-अर्पण किया तथा सातों भागों वाले उनके राज्य का कुशल-क्षेम पूछा।
 
श्लोक 9:  वसुहोम ने मान्धाता से, जो पूर्वकाल में ऋषियों द्वारा अनुसरण किये गये मार्ग पर चल रहा था, पूछा, "हे राजन, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?"
 
श्लोक 10:  कुरुनन्दन! तब मान्धाता ने अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ बैठे हुए महामुनि वसुहोम से पूछा॥10॥
 
श्लोक 11:  मान्धाता ने कहा - राजन! पुरुषोत्तम! आपने बृहस्पति के सम्पूर्ण मतों का अध्ययन किया है। साथ ही शुक्राचार्य के नीतिशास्त्र का भी आपको पूर्ण ज्ञान है।॥11॥
 
श्लोक 12:  इसलिए मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि दण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई? इससे पहले कौन-सी वस्तु चेतन थी? और इस दण्ड को सर्वश्रेष्ठ क्यों कहा गया है?
 
श्लोक 13:  इस समय यह दण्ड क्षत्रियों के हाथ में कैसे आया? महामते! यह सब मुझे बताओ। मैं तुम्हें गुरुदक्षिणा दूँगा॥13॥
 
श्लोक 14:  वसुहोम ने कहा, "हे राजन! दण्ड ही सम्पूर्ण जगत को नियमों के अधीन रखता है। यह धर्म का सनातन रूप है। इसका उद्देश्य प्रजा को उद्दण्डता से बचाना है। मैं तुम्हें इसकी उत्पत्ति का मार्ग बताता हूँ; सुनो।"
 
श्लोक 15:  हमने सुना है कि सम्पूर्ण लोकों के पिता भगवान ब्रह्मा ने एक बार यज्ञ करना चाहा; परन्तु उन्हें यज्ञ करने के लिए कोई भी योग्य पुरोहित नहीं मिला ॥15॥
 
श्लोक 16:  फिर उन्होंने कई वर्षों तक एक गर्भस्थ शिशु को अपने सिर पर धारण किया। जब एक हजार वर्ष बीत गए, तो ब्रह्माजी को छींक आई और वह गर्भस्थ शिशु नीचे गिर गया।
 
श्लोक 17:  शत्रु राजा! उनसे जो बालक प्रकट हुआ उसका नाम 'क्षुप' रखा गया। महाराज! महात्मा ब्रह्माजी के उस यज्ञ में प्रजापति क्षुप ऋत्विज बने। 17॥
 
श्लोक 18:  श्रेष्ठ! ब्रह्माजी का यज्ञ प्रारम्भ होते ही वहाँ प्रत्यक्ष यज्ञ की प्रधानता के कारण ब्रह्मा का दण्ड छा गया॥18॥
 
श्लोक 19:  दण्ड का उन्मूलन होते ही लोगों में वर्णसंकरता फैलने लगी। कर्तव्य-अकर्तव्य तथा क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य, इसका विचार सर्वथा लुप्त हो गया॥19॥
 
श्लोक 20:  फिर पीने-पिलाने का ख्याल कैसे रह जाता? सब एक-दूसरे पर हिंसा करने लगे। उस समय चीज़ों को पाने-पाने का ख्याल भी नहीं रहा। अपना और पराया धन एक समान समझा जाने लगा।
 
श्लोक 21:  जैसे कुत्ते मांस के टुकड़े के लिए एक-दूसरे से लड़ते और नोचते हैं, वैसे ही मनुष्य भी एक-दूसरे को लूटने लगे। बलवान मनुष्य दुर्बलों को मारने लगे। सर्वत्र अराजकता फैल गई॥21॥
 
श्लोक 22-23:  ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर पितामह ब्रह्मा ने सनातन भगवान विष्णु की आराधना करके कृपालु देव महादेवजी से कहा - 'शंकर! इस स्थिति में आपको दया करनी चाहिए। आपको ऐसा उपाय करना चाहिए कि संसार में वर्ण-विभेद न फैले।॥ 22-23॥
 
श्लोक 24:  तब बहुत देर तक विचार करने के बाद शूल नामक उत्तम अस्त्र को धारण करने वाले श्रेष्ठ महादेवजी दण्डरूप में प्रकट हुए॥24॥
 
श्लोक 25:  उसे धर्माचरण करते देख नीतिस्वरूपा देवी सरस्वती ने दण्डनीति की रचना की, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है ॥25॥
 
श्लोक 26:  बहुत समय तक विचार करने के बाद भगवान शूलपाणि ने प्रत्येक जाति के लिए एक राजा बनाया।
 
श्लोक 27:  उन्होंने सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र को देवरूप में प्रतिष्ठित किया और सूर्यपुत्र यम को पितरों का राजा बनाया ॥27॥
 
श्लोक 28:  उन्होंने धन और दानवों का स्वामी कुबेर को, पर्वतों का स्वामी सुमेरु को और नदियों का स्वामी समुद्र को बनाया॥ 28॥
 
श्लोक 29:  जल और दानवों के राज्य पर महाबली वरुणदेव को स्थापित किया। मृत्यु को जीवन का और अग्निदेव को प्रकाश का अधिपत्य प्रदान किया। 29॥
 
श्लोक 30:  विशाल नेत्रों वाले सनातन महात्मा महादेवजी ने स्वयं को रुद्रों का परम देवता और शक्तिशाली रक्षक बना लिया ॥30॥
 
श्लोक 31:  वशिष्ठ को ब्राह्मणों का, जातवेद को अग्नि को वसुओं का, सूर्य को तेजोमय ग्रहों का और चन्द्रमा को नक्षत्रों का अधिपति बनाया गया ॥31॥
 
श्लोक 32:  उन्होंने अंशुमान को लताओं का राजा तथा बारह भुजाओं से विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कंद को भूतों का राजा नियुक्त किया। 32.
 
श्लोक 33:  जिनका स्वरूप संहार और शील (उत्पादन) है, उन परमेश्वर ने काल को मृत्यु, सुख और दुःख इन चार प्रकार का स्वामी बनाया ॥33॥
 
श्लोक 34:  सबके देवता, राजाओं के राजा और मनुष्यों के अधिपति भगवान शिव ही समस्त रुद्रों के अधिष्ठाता हुए । ऐसा सुना जाता है ॥34॥
 
श्लोक 35:  उन्होंने ब्रह्माजी के छोटे पुत्र खुशुप को समस्त प्रजा और समस्त धर्मात्माओं का श्रेष्ठ शासक बनाया ॥35॥
 
श्लोक 36:  तदनन्तर जब ब्रह्माजी का यज्ञ विधिपूर्वक पूर्ण हो गया, तब महादेवजी ने धर्मरक्षक भगवान विष्णु का सत्कार करके उन्हें दण्ड प्रदान किया॥36॥
 
श्लोक 37:  भगवान विष्णु ने इसे अंगिरा को दिया। ऋषि अंगिरा ने इसे इंद्र और मरीचि को दिया और मरीचि ने इसे भृगु को सौंप दिया।
 
श्लोक 38-39:  भृगुन ने वह धर्मदण्ड ऋषियों को दिया। ऋषियों ने उसे लोकपालों को सौंप दिया, लोकपालों ने उसे खुशुप को सौंप दिया, खुशुप ने उसे सूर्यपुत्र मनु (श्रद्धदेव) को सौंप दिया और श्राद्धदेव ने उसे सूक्ष्म धर्म और अर्थ की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को सौंप दिया। 38-39॥
 
श्लोक 40:  अतः धर्मानुसार न्याय-अन्याय पर विचार करके ही दण्ड का निश्चय करना चाहिए, मनमाना नहीं करना चाहिए। दण्ड का मुख्य उद्देश्य दुष्टों का दमन करना है, न कि स्वर्णमुद्राओं से कोष भरना। दण्ड के रूप में स्वर्ण (धन) लेना बाह्य कर्म है। 40॥
 
श्लोक 41:  किसी नागरिक को अपंग बनाना, मारना, उसे तरह-तरह की यातनाएँ देना, उसे प्राण त्यागने के लिए विवश करना अथवा छोटे-से अपराध के कारण देश से निकाल देना कभी उचित नहीं है ॥ 41॥
 
श्लोक 42:  सूर्यपुत्र मनु ने प्रजा की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को दण्ड सौंपा था। वही दण्ड धीरे-धीरे अधिकारियों के हाथ में आकर प्रजा की रक्षा करता हुआ जागृत रहता है ॥ 42॥
 
श्लोक 43:  इन्द्र दण्ड देने में सदैव तत्पर रहते हैं। इन्द्र से तेजोमय अग्नि, अग्नि से वरुण तथा वरुण से प्रजापति उस दण्ड को ग्रहण करते हैं और उसका उचित उपयोग करने में सदैव तत्पर रहते हैं ॥43॥
 
श्लोक 44:  जो सम्पूर्ण जगत को शिक्षा देते हैं, वे प्रजापति से धर्म का दण्ड ग्रहण करते हैं और प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हैं। ब्रह्मा के पुत्र, जो धर्म के दण्ड को अपना सनातन धर्म मानते हैं, प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हैं।
 
श्लोक 45-46:  तेजस अपनी वृत्ति से दण्ड धारण करके जगत की रक्षा के लिए सजग रहता है। तेजस से औषधियाँ उत्पन्न होती हैं, औषधियों से पर्वत उत्पन्न होते हैं, पर्वतों से रस उत्पन्न होता है, रस से निरऋति उत्पन्न होती है और निरऋति से ज्योतियाँ उत्पन्न होती हैं, जो उस दण्ड को धारण करके जगत की रक्षा के लिए सजग रहती हैं। 45-46।
 
श्लोक 47:  ज्योतियों से दण्ड प्राप्त करके वेदों की स्थापना की गई है। वेदों से भगवान हयग्रीव और हयग्रीव से अविनाशी भगवान ब्रह्मा दण्ड प्राप्त करके जगत की रक्षा के लिए जागृत रहते हैं ॥ 47॥
 
श्लोक 48-49:  पितामह ब्रह्मा से दण्ड और रक्षा का अधिकार प्राप्त करके महादेव भगवान शिव जागृत होते हैं। शिव से विश्वेदेव, विश्वेदेवों से ऋषि, ऋषियों से सोमदेव, सोम से सनातन देवता और देवताओं से ब्राह्मण उत्पन्न हुए। उस अधिकार को ग्रहण करके वे प्रजा की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इसे तुम भली-भाँति समझ लो। 48-49॥
 
श्लोक 50:  तदनन्तर ब्राह्मणों से दण्ड भोगने का अधिकार प्राप्त करके क्षत्रिय अपने धर्मानुसार सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करते हैं। यह सनातन चराचर जगत् क्षत्रियों से ही सुरक्षित है ॥50॥
 
श्लोक 51:  इस संसार में प्रजा जागृत है और प्रजा में दण्ड जागृत है। वह दण्ड ब्रह्माजी के समान तेजस्वी है और सबको मर्यादा में रखता है ॥51॥
 
श्लोक 52:  भारत यह कालदण्ड ब्रह्माण्ड के आदि, मध्य और अन्त में जागृत रहता है। यह सर्व लोकेश्वर महादेव का स्वरूप है। यह समस्त प्रजा का रक्षक है। 52॥
 
श्लोक 53:  इस दण्ड के रूप में देवाधिदेव के कल्याण करने वाले, परमात्मा, जटाधारी, उमावल्लभ, लोकों के कल्याण करने वाले भगवान शिव सदैव जागृत रहते हैं ॥53॥
 
श्लोक 54:  इस प्रकार यह दण्ड आदि, मध्य और अन्त में सुविख्यात है। धर्म को जानने वाले राजा को इसी प्रकार न्यायपूर्वक आचरण करना चाहिए ॥ 54॥
 
श्लोक 55:  भीष्म कहते हैं: युधिष्ठिर! जो राजा इस प्रकार वसुहोम की सलाह सुनता है और उसके अनुसार आचरण करता है, वह अपनी समस्त मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
 
श्लोक 56:  नरश्रेष्ठ! भरतनन्दन! सम्पूर्ण धर्मजगत को मर्यादा में रखने वाले दण्ड के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें सब बातें बता दी हैं ॥56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)